डूबती नैया के खेवनहार को नाव में छेद का पता नहीं! संकट तूफान से नहीं, : संकट भीतर की दरारों से है
Editor
Sun, Oct 11, 2026
डूबती नैया के खेवनहार को नाव में छेद का पता नहीं!
संकट तूफान से नहीं, भीतर की दरारों से है!
Khabar Times 24| खोज सच की/Editorial Desk- त्वरित टिप्पणी -लखनऊ में एक ही पार्टी के दो गुटों में मारपीट से मचा बबाल!
राजनीति में सबसे बड़ा संकट तब नहीं आता, जब विरोधी ताकतवर हो जाते हैं। असली संकट तब शुरू होता है, जब अपने ही साथ छोड़ने लगें, संगठन की जड़ें कमजोर होने लगें और नेतृत्व अपनी प्रशंसा सुनने में इतना व्यस्त हो जाए कि उसे नाव में पड़े छेद दिखाई ही न दें।
डूबती नैया को किनारे लगाने का दावा करने वाले खेवनहार को शायद यह एहसास ही नहीं कि नाव की हालत अब पहले जैसी नहीं रही। पतवार हाथ में होना और नाव को सुरक्षित किनारे तक ले जाने की क्षमता होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
नेतृत्व की परीक्षा नारों से नहीं, नतीजों से होती है!
राजनीति में कुर्सी पर बैठना नेतृत्व नहीं है। नेतृत्व वह क्षमता है, जो संकट के समय बिखरते हुए संगठन को संभाले, नाराज साथियों को साथ लेकर चले, जनता का विश्वास बनाए रखे और बदलते राजनीतिक हालात को समय रहते समझ सके।
लेकिन जब नेतृत्व के आसपास केवल प्रशंसा करने वालों की भीड़ जुटने लगे, जमीनी कार्यकर्ताओं की आवाज अनसुनी होने लगे और संगठन की वास्तविक स्थिति बताने वालों को विरोधी समझा जाने लगे, तब पतन की पटकथा लिखी जाने लगती है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नेतृत्व को वास्तविकता बताने वाला कोई नहीं बचा, या फिर नेतृत्व वास्तविकता सुनना ही नहीं चाहता?
नाव में छेद हो तो पतवार बदलने से क्या होगा?
किसी भी राजनीतिक दल की ताकत केवल उसके बड़े नेताओं, चुनावी नारों और मंचों पर उमड़ने वाली भीड़ से नहीं मापी जा सकती। उसकी असली ताकत बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं, संगठन की एकजुटता, जनता के भरोसे और नेतृत्व की विश्वसनीयता में होती है। यूपी में कमोवेश स्थिति कांग्रेस पार्टी में यही देखने को मिल रही है। जिस कर्मठ व कद्दावर नेता ने प्रदेश में पार्टी की गिरती साख को उठाने का काम किया और देश के सबसे बड़े चेहरे को अपनी प्रतिद्वंदी चुनाव में कई राउंड में पीछे धकेलने का कार्य किया उसे दरकिनार करना कहीं न कहीं उक्त हेडिंग को बल देता है। अजय राय के बदले जाने से यूपी के कांग्रेस में नाराजगी देखने को जो मिली है,उससे यह साफ जाहिर होता है कि खेवनहार में कहीं न कहीं चापलूसी की चासनी लगी हुई है। यह हम नहीं आम जनता कहती नजर आती है। हालांकि प्रायः यह असंतोष लगभग सब जगह देखने को मिलता है,लेकिन आज की घटना पर त्वरित टिप्पणी को देखें तो यह आज की पार्टीगत घटना पर अधिक फिट बैठता है। खेवनहारों को ध्यान देने की अनिवार्यता है।

यदि कार्यकर्ता निराश हैं, संगठन में असंतोष है, पुराने साथी दूर जा रहे हैं और जनता के बीच पार्टी की स्वीकार्यता कमजोर हो रही है, तो केवल चेहरे बदलने या नए नारों के सहारे राजनीतिक नैया को पार लगाना आसान नहीं होगा।
समस्या नाव में हो और खेवनहार लहरों को दोष देता रहे, तो मंजिल दूर होती चली जाती है।
सबसे खतरनाक स्थिति आत्ममुग्ध नेतृत्व की होती है! राजनीति में गलतियां होना स्वाभाविक है, लेकिन गलतियों से सबक न लेना घातक साबित हो सकता है। चुनावी हार के बाद समीक्षा के बजाय दूसरों पर दोषारोपण, संगठन की कमजोरियों को स्वीकार करने के बजाय अपनी उपलब्धियों का बखान और जनता के सवालों का जवाब देने के बजाय विरोधियों पर हमला—ये संकेत किसी भी राजनीतिक दल के लिए चेतावनी हो सकते हैं।
लोकतंत्र में जनता अंतिम निर्णायक है। यहां कोई भी नेता स्थायी खेवनहार नहीं और कोई भी राजनीतिक दल हमेशा सत्ता में रहने की गारंटी लेकर नहीं आता।
जनता का विश्वास अर्जित करने में वर्षों लगते हैं, लेकिन उसे खोने के लिए कभी-कभी कुछ गलत फैसले ही पर्याप्त होते हैं।
अब सवाल खेवनहार से है!
क्या नेतृत्व नाव में पड़े छेद को पहचानकर उसकी मरम्मत करेगा? क्या वह अपने आसपास के प्रशंसकों से आगे बढ़कर जमीन की सच्चाई सुनेगा? क्या संगठन की कमजोरियों को स्वीकार करके सुधार की दिशा में कदम उठाएगा?
या फिर वह तब तक पतवार चलाता रहेगा, जब तक नाव की आखिरी उम्मीद भी पानी में समा नहीं जाती?
राजनीति में समय रहते खतरे की पहचान कर लेना ही दूरदर्शिता है। जो नेतृत्व चेतावनी को अवसर समझता है, वह संकट से उबर सकता है। लेकिन जो चेतावनी देने वालों को ही अपना दुश्मन मान लेता है, उसके लिए वापसी की राह कठिन होती जाती है।
याद रखिए—नैया को डुबोने के लिए हमेशा तूफान जिम्मेदार नहीं होता। कभी-कभी नाव का छेद ही काफी होता है और सबसे बड़ी त्रासदी तब होती है, जब खेवनहार को इसकी खबर सबसे आखिर में मिलती है!
— संजयः उवाच-संपादकीय | Khabar Times 24— खोज सच की
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