सनातन शरीर नहीं विचार है,जीवन का हर पल रहा धर्म को समर्पित,102 वर्षों : आज भी हैं प्रासंगिक शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज
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Mon, Sep 14, 2026
102वां प्राकट्य दिवस:
संत ही नहीं एक विचार हैं बड़े गुरु जी महाराज - महंत ब्रह्मचारी श्रीधरानंद महराज
क्यों आज भी याद किए जाते हैं ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती?
तपस्या, धर्मरक्षा और सनातन चेतना के ऐसे प्रहरी, जिन्होंने साधना के साथ समाज और राष्ट्र के प्रश्नों पर भी मुखर भूमिका निभाई
प्रयागराज- ब्रह्मलीन जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज के 102वें प्राकट्य दिवस पर देश भर में श्रद्धा और स्मरण का वातावरण है। इसी तारतम्य में श्री प्राचीन मनकामेश्वर महादेव मंदिर, प्रयागराज में उनके चित्र पर पूजन, पुष्पांजलि और श्रद्धांजलि अर्पित कर उनके जीवन और कार्यों को याद किया गया। सैकड़ों भक्तों ने आरती पूजन किया । मंदिर के महंत व शंकराचार्य जी के प्रिय शिष्य ब्रह्मचारी श्रीधरानंद महाराज ने पूरे मनोयोग व श्रद्धा से अपने गुरु द्विपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य जी का 102 वां प्राकट्य दिवस पादुका पूजन कर मनाया।
पूजन के बाद लोगों ने आपस में चर्चा कर शंकराचार्य जी के जीवंत स्मरणीय बातों का बखान कर रहे थे। आज भी इतने प्रासंगिक हैं स्वरूपानंद सरस्वती।लेकिन सवाल यह है कि स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का जीवन इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है और उनके जाने के बाद भी उनकी चर्चा क्यों बनी हुई है?

इस विषय पर शंकराचार्य जी के करीब रहे उनके प्रिय शिष्य,जो आज प्रयागराज के प्राचीन मनकामेश्वर मन्दिर के महंत हैं,वह अपने गुरु जी को याद कर उनके बारे में बताते हैं कि वह कितने प्रासंगिक रहे हैं और आज भी उनका योगदान सनातन धर्म के लिए कितना महत्वपूर्ण रहा है- उनका कहना है कि गुरु जी के तप,साधना व सनातन धर्म के लिए किए गए कार्यों को शब्दों में बयां नही किया जा सकता।
मन्दिर के महंत ब्रह्मचारी श्री धरानंद जी महाराज से चर्चा के बाद के शब्द आपके समक्ष हैं,जो स्वामी स्वरूपानंद जी के जीवंत साधना को उल्लेखित करते हैं-
बचपन से ही बैराग्य की ओर-
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का जन्म 2 सितंबर 1924 को मध्य प्रदेश के सिवनी क्षेत्र में पोथीराम उपाध्याय के रूप में हुआ था। युवा अवस्था में ही उनका झुकाव आध्यात्मिक जीवन की ओर हो गया। वे स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती और बाद में धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी से जुड़े। वर्ष 1950 में उन्हें दण्डी संन्यास की दीक्षा मिली।
19 वर्ष की उम्र में स्वतंत्रता आंदोलन -
उनके जीवन का एक उल्लेखनीय पक्ष यह भी रहा कि मात्र 19 वर्ष की आयु में उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया। इसके कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। आध्यात्मिक साधना के साथ राष्ट्र और समाज के प्रश्नों से उनका जुड़ाव आगे भी बना रहा।
एकांत में तपस्या करना ही तपस्या नहीं है बल्कि धर्मरक्षा का व्रत भी तप है-
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का जीवन केवल आश्रम और साधना तक सीमित नहीं रहा। वे गौहत्या बंदी और धर्मरक्षा जैसे विषयों पर सक्रिय रहे और इन आंदोलनों के दौरान उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। रामराज्य की अवधारणा से जुड़े, राम राज्य परिषद में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अयोध्या में राम जन्मभूमि से जुड़े आंदोलन में भी वे सक्रिय रहे और 1990 में शिलान्यास के प्रयास के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया था।
दो पीठों के शंकराचार्य के रूप में विशिष्ट पहचान -
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की सबसे विशिष्ट पहचान यह रही कि वे द्वारका शारदा पीठ और ज्योतिष्पीठ,दोनों से शंकराचार्य के रूप में जुड़े रहे। 1982 में वे द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य बने। ज्योतिष्पीठ के उनके आचार्य पद को लेकर बाद के वर्षों में उत्तराधिकार संबंधी विवाद भी रहे हैं, परन्तु पूरे दमखम के साथ वह दोनों पीठों पर पूज्यनीय रहे ,धार्मिक जगत में उनका प्रभाव व्यापक रहा और उन्होंने दशकों तक सनातन धर्म से जुड़े मुद्दों पर अपनी स्पष्ट और मुखर भूमिका निभाते रहे। उनके व्यक्तित्व व स्वरूप,धार्मिक आचरणों व विचारों के प्रति सनातनियों की गहरी आस्था रही,जुड़ाव रहा। तत्कालीन समय की सरकारें भी उनसे देश व धर्म के विषय में मार्गदर्शन प्राप्त करती रही हैं। वह सामाजिक सरोकारों व वंचित गरीब लोगों की मदद में काफ़ी रुचि रखते थे,यही कारण है कि मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ के वनवासी भी उनसे जुड़े रहे और अपनी आस्था उनके चरणों में न्योछावर करते रहे।

गंगा से लेकर गौ और धर्म तक का सफर -
गंगा की अविरलता और निर्मलता भी उनके प्रमुख सरोकारों में रही। उन्होंने गंगा पर बांधों और जल परियोजनाओं के प्रभाव को लेकर आवाज उठाई तथा गंगा की प्राकृतिक धारा और धार्मिक महत्ता की रक्षा की मांग की। वह करपात्री महाराज के काफ़ी करीब रहे,वह गौ माता को संवैधानिक रूप प्रतिष्ठा दिलाने चाहते थे। वह राष्ट्रहित को धर्महितार्थ कार्यों के साथ आगे बढ़ना ही सच्ची नीति मानते थे। यही कारण है कि उनके अनुयायियों के लिए उनका जीवन केवल एक संन्यासी का जीवन नहीं, बल्कि साधना, धर्मरक्षा, राष्ट्रचेतना और सनातन परंपरा के प्रति प्रतिबद्धता का उदाहरण माना जाता है। उनके दो प्रमुख शिष्य आज शंकराचार्य पद पर सुशोभित हैं।

11 सितंबर 2022 को ली समाधि,लेकिन विचार आज भी जीवित-
11 सितंबर 2022 को नर्मदा क्षेत्र के नरसिंहपुर, मध्य प्रदेश में उन्होंने देह त्याग किया। उनके निधन पर देश के विभिन्न राजनीतिक और धार्मिक नेताओं ने श्रद्धांजलि दी। उनके अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।
आज क्यों किया जा रहा है याद?
क्योंकि स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का जीवन एक ऐसे संत की कहानी है, जिसने,कम उम्र में स्वतंत्रता आंदोलन देखा, संन्यास लेकर कठोर साधना की, धर्म और गौ संरक्षण के लिए संघर्ष किया, रामजन्मभूमि के प्रश्न पर मुखर रहे, गंगा की अविरलता की आवाज उठाई, और शंकराचार्य परंपरा के माध्यम से सनातन धर्म के प्रश्नों को राष्ट्रीय विमर्श में बनाए रखा। कहा यह भी जाता है कि राममंदिर वहीं बना जहां वह चाहते थे जिन्हें पॉइंट आउट कर उन्होंने बताया था। गवाही के रूप में उनके उत्तराधिकारी वर्तमान ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज जो कि तत्कालीन दण्डी स्वामी थे वह रहे। इसीलिए 102वें प्राकट्य दिवस पर देश भर में चाहे वह छत्तीसगढ़ का सलधा हो,रायपुर मठ हो,जबलपुर हो,परमहंसी गंगा मध्यप्रदेश हो या फिर काशी और प्रयागराज में हो रहा स्मरण केवल एक संत की जयंती का आयोजन नहीं, बल्कि उनके तप, त्याग और धर्मचेतना को याद करने का अवसर है।
— संजय शेखर मिश्रा KhabarTimes24.co.in
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