दिग्विजय सिंह की ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ कितनी कारगर? : सनातन की सुगंध राजनीति में घुले, इसमें आपत्ति नहीं; लेकिन राजनीति की गंध सनातन के मूल स्वरूप पर हावी न हो
दिग्विजय सिंह की ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ कितनी कारगर?
सनातन की एकजुटता का प्रयास या राजनीति के बीच धार्मिक चेतना जगाने की कवायद?
संजयः उवाच | विशेष संपादकीय-
सनातन धर्म, साधु-संतों और मंदिरों की मर्यादा का प्रश्न जब राजनीति के केंद्र में आता है, तो उसके साथ कई सवाल भी खड़े होते हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ भी ऐसे ही सवालों के बीच चर्चा में है।
विजयदशमी के अवसर पर उज्जैन के महाकालेश्वर धाम से अयोध्या तक प्रस्तावित इस यात्रा का घोषित उद्देश्य सनातन धर्म के मूल्यों, देवस्थानों की पवित्रता तथा मंदिरों में कथित अनियमितताओं के विरुद्ध जनजागरण करना है। यात्रा के लिए ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और द्वारका शारदापीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती के शुभकामना संदेश मिलने की खबरें भी सामने आई हैं। दोनों शंकराचार्य ने दिग्विजय सिंह के आग्रह पर अपना आशीर्वाद व समर्थन पत्र जारी किया है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह यात्रा वास्तव में सनातन समाज को एकजुट करने की दिशा में आगे बढ़ेगी, या धार्मिक मुद्दों के माध्यम से राजनीतिक विमर्श को नया रूप देने का प्रयास बनकर रह जाएगी?
सनातन की बात करने का अधिकार किसी एक दल की बपौती नहीं
सनातन धर्म किसी राजनीतिक दल की स्थापना के साथ अस्तित्व में नहीं आया और न ही किसी दल के विरोध या समर्थन से उसका अस्तित्व निर्धारित होता है।
उसकी परंपरा, दर्शन और आध्यात्मिक विरासत राजनीति से कहीं अधिक व्यापक हैं। इसलिए सनातन धर्म के मूल्यों की बात करने वाले किसी भी व्यक्ति का स्वागत उसके राजनीतिक परिचय के आधार पर नहीं, बल्कि उसके विचारों, आचरण और कार्यों के आधार पर होना चाहिए।
दिग्विजय सिंह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं। ऐसे में उनकी धार्मिक यात्रा का राजनीतिक संदर्भों में देखा जाना स्वाभाविक है। लेकिन केवल उनके कांग्रेस नेता होने के कारण यात्रा के घोषित उद्देश्य को खारिज कर देना भी उचित नहीं होगा।
असली कसौटी यह है कि यात्रा सनातन के मूल सिद्धांतों को कितना आगे बढ़ाती है और उसके माध्यम से समाज को क्या ठोस संदेश मिलता है।
शंकराचार्य का समर्थन पत्र क्या संकेत देता है?
इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पहलू शंकराचार्यों के शुभकामना संदेश हैं।
ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के संदेश में सत्य, अहिंसा, पवित्रता, नीति और देवालयों की मर्यादा को सनातन के वास्तविक स्वरूप से जोड़ा गया है। द्वारका शारदापीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती की ओर से भी यात्रा के लिए शुभकामना संदेश दिए जाने की चर्चा भी जोरो पर है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा।
किसी धार्मिक यात्रा को शंकराचार्य का आशीर्वाद मिलना उसके घोषित धार्मिक उद्देश्य को समर्थन मिलने का संकेत हो सकता है। लेकिन इसे किसी राजनीतिक दल, उसकी विचारधारा या उसके समस्त राजनीतिक कार्यक्रमों का समर्थन मान लेना अलग बात होगी।
इसलिए शंकराचार्य के संदेशों को उनके वास्तविक संदर्भ में समझना आवश्यक है।
धर्माचार्यों की भूमिका सत्ता के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उनका नैतिक दायित्व धर्म, सत्य, मर्यादा और जनकल्याण के प्रश्नों पर समाज का मार्गदर्शन करना भी है।
सनातन की एकजुटता का अर्थ क्या केवल यात्रा निकालना है?
सनातन समाज की एकजुटता का प्रश्न केवल धार्मिक नारों या पदयात्राओं से हल नहीं हो सकता।
यदि उद्देश्य वास्तव में सनातन की प्रतिष्ठा और एकता है, तो कुछ बुनियादी सवालों के उत्तर भी सामने आने चाहिए। कुछ ऐसे प्रश्न जो इस यात्रा में समाहित होकर उसकी यथार्थता को बल देंगे। यदि इन प्रश्नों को कांग्रेस नेता लेकर यात्रा करते हैं तब तो सनातनी समर्थन का कुछ सकारात्मक रुझान हो सकता है,अन्यथा राजनीतिक पार्टी ने पोलिटिकल अंश का किरदार तो राम को बना ही चुकी है। राम नारों में नही राम जीवन के आदर्शों में होने चाहिए।
यात्रा के दौरान क्या होने चाहिए सत्य सनातनी बिंदु- यही प्रश्न -
1.क्या मंदिरों की व्यवस्था और चढ़ावे के उपयोग में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए ठोस पहल होगी?
2.क्या विभिन्न मठों, मंदिरों और धार्मिक परंपराओं के बीच संवाद बढ़ाने का प्रयास होगा?
3.क्या जातिगत भेदभाव, सामाजिक दूरी और धार्मिक संस्थाओं से जुड़ी समस्याओं पर भी चर्चा होगी?
4.क्या सनातन के नाम पर होने वाले किसी भी प्रकार के अन्याय के विरुद्ध समान मानदंड अपनाए जाएंगे?
5.क्या गो माता को राष्ट्र माता बनाने की आवाज गूंजेगी? क्या दिग्विजय सिंह गो हत्या प्रतिबंध व गो माता के सम्मान की बात करेंगे?
6.क्या यात्रा के बाद भी इन विषयों पर जनजागरण और जवाबदेही का अभियान जारी रहेगा?
राजनीति की छाया से कैसे अलग होगी धार्मिक चेतना?
दिग्विजय सिंह की यात्रा का राजनीतिक संदर्भ इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके घोषित मुद्दों में मंदिरों के दान की पारदर्शिता के साथ-साथ कथित ‘वोट चोरी’ का विषय भी शामिल है। उनकी ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में इन मुद्दों पर जवाबदेही की मांग की गई है।
इससे यात्रा का स्वरूप केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विमर्श से जुड़ा हुआ भी दिखाई देता है।
यह अपने आप में असामान्य नहीं है। धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन, सार्वजनिक धन की पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही जैसे विषय सार्वजनिक चर्चा के दायरे में आते हैं।
लेकिन यहां चुनौती है कि धार्मिक आस्था को राजनीतिक लाभ का साधन बनने से कैसे रोका जाए।
यदि यात्रा में मंदिरों की पारदर्शिता, धार्मिक संस्थाओं की जवाबदेही और सनातन के मूल्यों पर तथ्यपूर्ण चर्चा होती है, तो उसका सामाजिक महत्व हो सकता है। इसके विपरीत, यदि उसका प्रमुख परिणाम राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहता है, तो व्यापक धार्मिक एकता का लक्ष्य पीछे छूट सकता है।
अंततः इसका मूल्यांकन नारों से नहीं, बल्कि यात्रा के दौरान उठाए गए सवालों, प्रस्तुत प्रमाणों और उसके बाद किए गए कार्यों से होना चाहिए।
क्या सनातन की सुगंध राजनीतिक हवा में घोली जा रही है?
यह इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प प्रश्न है।आज धार्मिक प्रतीकों और सनातन से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक दलों के बीच विमर्श लगातार दिखाई देता है। ऐसे माहौल में किसी नेता की धार्मिक यात्रा को केवल आध्यात्मिक पहल या केवल राजनीतिक रणनीति घोषित कर देना, पर्याप्त तथ्यों के बिना जल्दबाजी होगी।किसी भी राजनीतिक व्यक्ति के उद्देश्यों का वास्तविक आकलन उसके सार्वजनिक वक्तव्यों, घोषित कार्यक्रम, कार्यों और परिणामों के आधार पर होना चाहिए।
दिग्विजय सिंह की यात्रा भी इसी कसौटी पर परखी जाएगी।
क्या यह यात्रा सनातन के उन मूल्यों को प्रमुखता देगी जो सत्य, न्याय, अहिंसा, करुणा और धार्मिक मर्यादा पर आधारित हैं? क्या यह मंदिरों की व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग को किसी ठोस परिणाम तक पहुंचाएगी? और क्या इसके मंच से राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर धार्मिक एवं सामाजिक संवाद को स्थान मिलेगा?
इन सवालों का उत्तर ही यात्रा की वास्तविक दिशा स्पष्ट करेगा।
यात्रा की सफलता भीड़ से नहीं, उद्देश्य की पूर्ति से तय होगी-
दिग्विजय सिंह की ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ के सामने दोहरी चुनौती है—अपने घोषित धार्मिक और सामाजिक उद्देश्यों को प्रमाणिकता के साथ आगे बढ़ाना तथा राजनीतिक आरोपों के बीच अपनी मूल विषयवस्तु को बनाए रखना।
शंकराचार्यों के शुभकामना संदेश इस यात्रा को धार्मिक विमर्श में एक महत्वपूर्ण संदर्भ देते हैं, लेकिन किसी भी यात्रा की दीर्घकालिक सफलता उसके व्यावहारिक परिणामों पर निर्भर करती है।
सनातन धर्म को न किसी राजनीतिक दल के प्रमाणपत्र की आवश्यकता है, न किसी नेता के विरोध से उसकी प्रतिष्ठा समाप्त होती है। उसकी वास्तविक शक्ति उसके दर्शन, परंपरा, साधना और आचरण में निहित है।
इसलिए सवाल यह नहीं कि दिग्विजय सिंह सनातन की बात क्यों कर रहे हैं। असली सवाल यह है कि उनकी यात्रा सनातन के लिए क्या ठोस काम करेगी?
यदि यह यात्रा धार्मिक संस्थाओं की पारदर्शिता, सामाजिक समरसता और धर्म की मर्यादा के लिए सार्थक पहल करती है, तो उसका महत्व राजनीतिक सीमाओं से आगे जा सकता है। यदि यह केवल राजनीतिक विमर्श का एक और मंच बनकर रह जाती है, तो सनातन की व्यापक एकजुटता का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
सनातन की सुगंध राजनीति में घुले, इसमें आपत्ति नहीं; लेकिन राजनीति की गंध सनातन के मूल स्वरूप पर हावी न हो—यही इस यात्रा की सबसे बड़ी परीक्षा है।
— संजयः उवाच/khabartimes24
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