कौन श्रीराम के पथ पर चल रहा है? : यदि रावण मर चुका है, तो फिर अहंकार क्यों जीवित है?
Editor
Tue, Oct 20, 2026
कौन श्रीराम के पथ पर चल रहा है?
आज शबरी कहाँ है, वैद्य सुषेण किस राज्य में रहते हैं और क्या रावण सचमुच मर चुका है? सीता का पता लगाने वाले हनुमान कहाँ हैं?
संजयः उवाच | विशेष संपादकीय
हर वर्ष विजयादशमी आती है। रावण के पुतले जलते हैं,आतिशबाजी होती है,जय श्रीराम के उद्घोष गूँजते हैं और हम बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाते हैं। लेकिन उत्सव समाप्त होते ही एक सवाल फिर खड़ा हो जाता है—क्या रावण सचमुच मर चुका है, या उसके विचार अमर होकर हमारे समाज में विचरण कर रहे हैं?
यदि रावण मर चुका है, तो फिर अहंकार क्यों जीवित है?
यदि अधर्म पर धर्म की विजय हो चुकी है, तो अन्याय के सामने न्याय आज भी विवश क्यों दिखाई देता है?
यदि हम श्रीराम के अनुयायी हैं, तो समाज में पीड़ितों की पुकार अनसुनी क्यों रह जाती है?
ये सवाल किसी एक व्यक्ति, दल या सरकार से नहीं, बल्कि हम सबकी आत्मा से हैं।
आज वह शबरी कहाँ है?
त्रेतायुग की शबरी केवल रामायण का एक पात्र नहीं, बल्कि श्रद्धा, प्रतीक्षा और निष्कपट प्रेम का प्रतीक है।
भगवान श्रीराम ने शबरी के प्रेम को स्वीकार करके यह संदेश दिया कि भक्ति का मूल्य व्यक्ति की सामाजिक हैसियत से नहीं, उसके भाव से निर्धारित होता है।
लेकिन आज हमारी शबरी कौन है?
वह निर्धन महिला, जिसे न्याय के लिए वर्षों तक भटकना पड़ता है।
वह वंचित व्यक्ति, जिसकी आवाज सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुँचती।
वह वृद्ध माँ, जिसे अपने ही घर में सहारे की प्रतीक्षा है।
वह गरीब, जिसके लिए धर्म के बड़े-बड़े आयोजन तो होते हैं, लेकिन जीवन की बुनियादी समस्याएँ जस की तस रहती हैं।
श्रीराम के पथ पर चलने का अर्थ केवल शबरी की कथा सुनाना नहीं, बल्कि अपने समय की शबरी का सम्मान करना भी है।
वैद्य सुषेण आज किस राज्य में रहते हैं?
रामायण में वैद्य सुषेण उस समय सामने आते हैं, जब लक्ष्मण मूर्छित होकर युद्धभूमि में गिर जाते हैं। उनके उपचार के लिए संजीवनी बूटी लाने का प्रसंग रामकथा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यह प्रसंग संकट में पड़े व्यक्ति की सहायता, ज्ञान के सदुपयोग और जीवन बचाने के संकल्प की याद दिलाता है।
आज के वैद्य सुषेण कौन हैं?
वे चिकित्सक, जो संसाधनों की कमी के बावजूद मरीजों की सेवा करते हैं। वे स्वास्थ्यकर्मी, जो कठिन परिस्थितियों में जीवन बचाते हैं। वे लोग, जो किसी घायल या असहाय व्यक्ति की सहायता करने के लिए आगे आते हैं।
लेकिन सवाल यह भी है कि क्या गरीब को समय पर उपचार मिल रहा है? क्या गंभीर बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति के लिए स्वास्थ्य सुविधाएँ सुलभ हैं? क्या समाज जीवन बचाने वालों का सम्मान करता है?
माता सीता की पता लगाने वाले,संजीवनी लाने वाले वह हनुमान कहाँ हैं?
रामराज्य की कल्पना केवल मंदिरों की भव्यता से नहीं, बल्कि इस बात से भी जुड़ी है कि संकट में पड़े व्यक्ति को सहायता मिलती है या नहीं।
वैद्य सुषेण किसी एक राज्य में नहीं, बल्कि हर उस स्थान पर दिखाई देते हैं जहाँ ज्ञान, सेवा और करुणा मिलकर किसी का जीवन बचाते हैं। हनुमान का काम हर मुश्किल काम को आसान करने और संकट का हरण कर संजीवनी लाने का था। अब वह कौन लाएगा कौन सीता माता रूपी स्त्री के हरण व हो रहे अत्याचार पर आघात कौन करेगा,यह प्रश्न खोजता है जलने वाला रावण? पूंछता है सत्य सनातन का वह त्रेतायुगीन काल का वर्तमान समय! है आज रावण दहन करने वाले किसी प्रपंची नाट्य कलाकारों के पास,क्या किसी राजनेताओं के पास जो बड़े अकड़ कर हाथ में धनुष बाण लेकर तनते हुए घड़े होते हैं और रावण का पुतला दहन करते हैं! क्या आज राम है कोई? अगला सवाल फिर सामने खड़ा है-
क्या रावण अमर होकर समाज में विचरण कर रहा है?
रावण का शरीर भले ही रामायण की कथा में समाप्त हो गया, लेकिन रावण के प्रतीकात्मक रूप को हम आज भी अपने आचरण में पहचान सकते हैं।
जब सत्ता अहंकार में बदल जाती है, जब शक्तिशाली व्यक्ति निर्बल का अधिकार छीनता है, जब स्त्री की गरिमा का हनन होता है, जब ज्ञान का उपयोग लोककल्याण के बजाय दूसरों को दबाने के लिए किया जाता है और जब अन्याय देखकर भी लोग मौन रहते हैं—तब रावण के चरित्र से जुड़ी प्रवृत्तियाँ हमारे सामने दिखाई देती हैं।
लेकिन रावण को केवल किसी दूसरे व्यक्ति में खोज लेना आसान है। कठिन काम है अपने भीतर के अहंकार, लोभ और अन्याय को पहचानना।
रावण का पुतला जलाना परंपरा है, लेकिन अपने भीतर की बुराइयों को जलाना आत्मशुद्धि है।
विजयादशमी की सार्थकता तभी बढ़ती है, जब उत्सव के साथ हमारे व्यवहार में भी बदलाव आए।
श्रीराम के पथ पर कौन चल रहा है?
यह प्रश्न कांग्रेस, भाजपा या किसी अन्य राजनीतिक दल तक सीमित नहीं होना चाहिए। किसी राजनीतिक दल का नाम लेना या श्रीराम का उद्घोष करना अपने आप में किसी को राम के आदर्शों का प्रमाणपत्र नहीं देता।
श्रीराम के आदर्शों पर चलने की कसौटी है—न्याय, मर्यादा, कर्तव्य, करुणा और लोककल्याण।
जो कमजोर की रक्षा करता है, वह राम के आदर्शों के निकट जाने का प्रयास करता है। जो अपने अधिकारों के साथ दूसरों के अधिकारों का भी सम्मान करता है, वह मर्यादा का पालन करता है। जो अपने पद और शक्ति का उपयोग जनहित में करता है, वह कर्तव्य को महत्व देता है।
यही कसौटी आम नागरिक पर भी लागू होती है और सत्ता में बैठे व्यक्ति पर भी।
धर्म का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं हो सकता कि कौन उसके नाम का सबसे ऊँचा उद्घोष करता है। यह भी देखना होगा कि उसके आचरण में धर्म के मूल्यों का कितना स्थान है।
इस विजयादशमी पर एक सवाल अपने आपसे भी पूछिए!
हम रावण को जलाएँगे, लेकिन क्या अहंकार को भी जलाएँगे?
हम श्रीराम का जयघोष करेंगे, लेकिन क्या अन्याय के विरुद्ध खड़े होंगे?
हम शबरी की भक्ति का गुणगान करेंगे, लेकिन क्या समाज के अंतिम व्यक्ति को सम्मान देंगे?
हम वैद्य सुषेण की कथा सुनेंगे, लेकिन क्या संकट में पड़े किसी व्यक्ति की सहायता करेंगे?
और हम रामराज्य की चर्चा करेंगे, लेकिन क्या अपने आचरण में न्याय और मर्यादा को स्थान देंगे?
क्योंकि श्रीराम का पथ किसी राजनीतिक मंच से नहीं, सत्य और कर्तव्य के आचरण से पहचाना जाएगा।
रावण का अंत केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक घटना का स्मरण नहीं, बल्कि उस अहंकार और अन्याय के विरुद्ध निरंतर संघर्ष का संदेश भी है, जो मनुष्य और समाज को भीतर से कमजोर करता है।
इस बार रावण का पुतला ही नहीं, अपने भीतर के अहंकार को भी जलाइए। श्रीराम के नाम का उद्घोष ही नहीं, उनके आदर्शों का अनुसरण भी कीजिए।
जय श्रीराम!
✍️ संजयः उवाच
विज्ञापन
विज्ञापन