बहस का विषय- गो माता के संवैधानिक सम्मान पर बहस क्यों नहीं? : पब्लिक बनाम पार्लियामेंट
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Sun, Sep 20, 2026
प्रयागराज- प्रश्न भारत की आत्मा का है.
संजयः उवाच- संपादकीय
क्या गौ माता केवल राजनीति का मुद्दा हैं?
या संस्कृति, कृषि और संवेदनात्मक विरासत से जुड़ा राष्ट्रीय संवाद का विषय?
भारतीय राजनीति में गौ माता का प्रश्न नया नहीं है। चुनावों में इसका उल्लेख हुआ है,आंदोलनों में यह मुद्दा बना है और अलग-अलग राज्यों में गोवंश संरक्षण को लेकर अलग-अलग कानून और नीतियां भी हैं। लेकिन क्या गाय को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना इस पूरे विषय को बहुत छोटा कर देना नहीं है?
गौ माता का प्रश्न केवल आस्था का प्रश्न नहीं है। भारतीय ग्रामीण जीवन में गोवंश का संबंध दूध, पशुपालन, कृषि और किसान की आजीविका से भी रहा है। केंद्र सरकार की वर्तमान नीतियां भी देशी गोवंश के संरक्षण, नस्ल सुधार और दुग्ध उत्पादकता को कृषि एवं ग्रामीण आजीविका से जोड़ती हैं। राष्ट्रीय गोकुल मिशन इसी उद्देश्य से संचालित है। लेकिन देशी नस्ल पर हो रहा प्रहार क्यों सुनाई दे रहा है? सरकार की नीतियां कागजों पर ही क्यों रेखांकित होती हैं,धरातल पर इन्हें सांप क्यों सूंघ जाता है! यह भी दीर्घ प्रश्न है।
यह सिर्फ धर्माचार्यों का ही विषय है आम जनता या जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों का नहीं?
यह एक बहुत ही साधारण सा सवाल है जो जनता के मन से उपजता है। गौ माता हमारी आस्था का विषय हो सकती हैं लेकिन वह सबसे पहले एक पोषक जननी की तरह हैं जो कि मानव के जन्म से जुड़ाव पैदा करती हैं। धार्मिक मंचों पर,कथावाचक के पंडालों में,मंदिरों के जयकारों में नारा तो सुनाई देता है प्रतिदिन,लेकिन धर्माचार्य ही इसके जिम्मेदार हों यह सही नही है। इस वक्त पूरे देश में नया वातावरण पैदा किया ज्योतिर्मठ के वर्तमान पूज्य शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी ने जहां गौ माता को राष्ट्र माता बनाने की मुहिम तेज हुई,आंदोलन के रूप मे यह अभियान दिखने लगा,परन्तु यह अभियान राजनीतिक संकट न पैदा कर दे,नेताओं ने इस पर खेल शुरू करा दिया। साधु संतों व गौ माता के अभियान में ही बंटवारे की सेंध शुरू करने की कोशिश होने लगी। शंकराचार्य ने गौ माता की प्रतिष्ठा को अपने जीवन का उद्देश्य बता कर सनातनियों को जोड़ने का काम किया। परन्तु,जनप्रतिनिधियों ने इस विषय पर मौन साध लिया है। राष्ट्र माता बनाने का अधिकार पार्लियामेंट में सुरक्षित है जहां संविधान व कानून पर बहस होती है। जनता के वोट से जनप्रतिधि बनकर संसद में नेता जाते हैं,परन्तु वहां की चासनी में डूब कर जनता के धरातलीय बातों को भूल जाते हैं। यह अधिकार जनता व जन प्रतिनिधियों का है जो अब सीधे तौर पर गविष्टि यात्रा के उद्देश्य व सम्मान की बात करें।
संविधान में भी मौजूद है गोवंश संरक्षण का संदर्भ
यह भी महत्वपूर्ण है कि गौ संरक्षण की चर्चा केवल धार्मिक या राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 48 में राज्य को कृषि और पशुपालन को आधुनिक एवं वैज्ञानिक आधार पर व्यवस्थित करने का स्पष्ट मत है।
अर्थात संविधान ने इस विषय को राज्य की नीति के एक हिस्से के रूप में स्थान दिया है।
फिर सवाल यह है कि—
क्या गौ माता की प्रतिष्ठा पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर संवाद नहीं होना चाहिए?
संरक्षण और प्रतिष्ठा—क्या दोनों एक ही बात हैं?
यहीं से एक बड़ा सामाजिक प्रश्न जन्म लेता है।क्या “गो माता को राष्ट्र माता” कहना केवल राजनीतिक नारा है?
किसी भी लोकतांत्रिक समाज में किसी मांग को राजनीतिक मुद्दा बनना अपने-आप में अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन यदि कोई विषय करोड़ों लोगों की आस्था, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पशुपालन, कृषि और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा हो, तो उस पर चर्चा को केवल दलगत राजनीति तक सीमित करना भी पर्याप्त नहीं हो सकता। किसी एक दल की न तो यह मांग हो सकती और न ही वोट जुटाने का साधन। ब्रिटिश जमाने से चली आ रही गो-वध की टीस स्वतंत्र भारत में भी गुलामी की जंजीर की याद दिलाती है। वह कौन सा कानून है जो गो माता की हत्या रुकवाने में और राष्ट्र प्रतिष्ठा संवैधानिक रूप से नही दिला पाने में रुकावट है?
यदि कोई बाधा है तो उसको जनता के सामने रखना चाहिए। यदि ऐसा नही कर पाते जनप्रतिनिधि,कम से कम गो माता की प्रतिष्ठा को राजनीतिक नारा तो नही बनाना चाहिए।
जन जन की गूंज में गाय-पशु नहीं माता है-
हाल ही में यूपी में गविष्टि यात्रा निकालकर शंकराचार्य जी ने जन जन से गो माता प्रतिष्ठा के संबध में संवाद किया। प्राथमिक संवाद विषय में मात्र दो प्रश्न थे- गाय पशु है या माता ! जहां जहां भी शंकराचार्य जी गए हर व्यक्ति से यही सवाल किया और हर व्यक्ति ने यही जबाब दिया कि गाय हमारी माता है। यह श्रद्धा का विषय हो सकता है एक धर्म विशेष के लोगों का,ऐसा कहा जा सकता है। लेकिन इससे इतर यह भी देखा गया कि गैर सानातनी भी यात्रा में आकर अपना लिखित समर्थन गो माता को राष्ट्रीय सम्मान दिलाये जाने का सौंपा है। इस विषय कई लोगों की राय भी ली गई,उनका मानना है कि आस्था और संविधान के बहस में समन्वय कैसे बन पाएगा,इसको सोचना होगा सरकार को। और सरकार सोच सकती है,कर सकती है उसके अधिकार क्षेत्र में है कानून बनाना,संसोधन करना। क्योंकि आस्था को भी कानून का अमली जामा पहनाया गया है। मन्दिर आस्था का विषय है लेकिन उस में कानून घुसा हुआ है न। आचार्य मधुकांत जी कहते हैं कि यदि सरकार मन्दिर,मठ पर सँविधान का पहरा लगा सकती है तो गौ माता को राष्ट्र माता का सम्मान क्यों नही ? वैसे भी जानवर,वृक्ष,नदी, प्रतीक,ध्वज,और मुद्रा का राष्ट्रीय सुरक्षा व सम्मान सुरक्षित है,तो जो सबको दूध पिला रही है,पूरे राष्ट्र में ऐसा कोई समुदाय नही है जो गौ माता का दूध न पिता हो! जब समूचा राष्ट्र गो माता का दूध पीता है तो उस माता को राष्ट्र माता बनाने में हिचक व पाबंदी क्यों? यह प्रश्न भी तथ्य से परे नही है और कानूनी प्रावधान भी अपनी जगह खड़ा है। आवश्यकता है समन्वय व संवाद की।
जरूरत शायद इस बात की है कि बहस भावनात्मक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़े।
गौ संरक्षण कैसे हो?
गोवंश आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कैसे मजबूत किया जाए?बेसहारा गोवंश की समस्या का स्थायी समाधान क्या हो?
देशी नस्लों का संरक्षण कैसे हो?
किसान और गो-पालक को आर्थिक लाभ कैसे मिले?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या “राष्ट्र माता” की मांग को संवैधानिक, सामाजिक और राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनाया जाना चाहिए?
इन प्रश्नों के उत्तर किसी एक राजनीतिक दल, संगठन या व्यक्ति के पास नहीं हैं।यह बहस संसद, सरकार, किसान, पशुपालक, पशु-कल्याण विशेषज्ञ, अर्थशास्त्री, धर्माचार्य और आम नागरिक,सभी के बीच हो सकती है।
गौ माता : वोट से आगे की बात
यदि गाय केवल चुनावी मौसम में याद आती है, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि उसके संरक्षण और सम्मान की चर्चा पूरे वर्ष क्यों न हो?
और यदि गौ माता भारतीय समाज की संस्कृति और कृषि से जुड़ी विरासत हैं, तो उनकी स्थिति को लेकर ठोस नीति, संसाधन, पशु-चिकित्सा व्यवस्था, चारा, गौशाला प्रबंधन और किसान की आय जैसे व्यावहारिक प्रश्न भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
इसलिए असली बहस शायद यह नहीं कि—
“गौ माता किस राजनीतिक दल की हैं?”
बल्कि यह है कि—
“गौ माता के संरक्षण और सम्मान की जिम्मेदारी किसकी है?”
और शायद यही वह बिंदु है जहां से दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय संवाद शुरू हो सकता है।
गौ माता को राष्ट्र माता का सम्मान मिले या नहीं—यह एक संवैधानिक और लोकतांत्रिक विमर्श का विषय है।
लेकिन इस प्रश्न पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए या नहीं—इस पर संवाद से बचना शायद समाधान नहीं है।
गौ माता को राजनीति के मंच से निकालकर
राष्ट्रीय नीति, कृषि, संस्कृति और संवेदना के व्यापक मंच पर रखकर देखने का समय आ गया है।
संजय शेखर
संजयः उवाच | Khabar Times
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