मनुस्मृति जली,लेकिन राजनीति में क्या जलेगा? : जाति का सवाल या सनातन की संवेदना?
Editor
Tue, Sep 1, 2026
मनुस्मृति जली, लेकिन राजनीति में क्या जलेगा?

संजय का कथन,सत्य का चिंतन
मनुस्मृति जलाने की घटना को केवल एक पुस्तक जलाने की घटना मानना राजनीति की उस गहरी परत को नजरअंदाज करना होगा, जहाँ प्रतीक, पहचान और वोट—तीनों एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
सवाल यह नहीं है कि मनुस्मृति जली या नहीं।
बड़ा सवाल यह है कि इस आग से राजनीति में किसका समीकरण गर्म होगा और किसका ठंडा पड़ेगा?
एक पक्ष इसे सामाजिक न्याय और समानता की लड़ाई के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत कर सकता है। दूसरा पक्ष इसे सनातन परंपरा और हिंदू अस्मिता के अपमान के रूप में देख सकता है। परिणामतः जिस मुद्दे को उठाने का उद्देश्य सामाजिक न्याय की राजनीति को मजबूत करना हो, वही मुद्दा धार्मिक पहचान की राजनीति को भी ऊर्जा दे सकता है।
असली आग कहाँ लगेगी?
1. आरक्षण की राजनीति में-
मनुस्मृति को लेकर होने वाली बहस जाति और आरक्षण के प्रश्न को फिर केंद्र में ला सकती है। दलित-पिछड़ा राजनीति इसे अपने पक्ष में लामबंदी के लिए इस्तेमाल कर सकती है, जबकि विरोधी पक्ष इसे हिंदू समाज को एकजुट करने के मुद्दे के रूप में उठा सकता है।
2. कांग्रेस के लिए चुनौती
यदि कांग्रेस इस मुद्दे को स्पष्ट सामाजिक न्याय के एजेंडे के साथ नहीं संभाल पाती, तो उसे दो तरफ से राजनीतिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है—एक तरफ उसके परंपरागत सामाजिक न्याय समर्थक, दूसरी तरफ धार्मिक भावनाओं से जुड़े मतदाता।
3. भाजपा के लिए अवसर
भाजपा इसे सीधे राजनीतिक मुद्दे में बदलने में सफल होती है तो वह इसे 'सनातन बनाम अपमान' की राजनीतिक कथा में बदल सकती है। इससे जातीय विभाजन के ऊपर हिंदू पहचान का विमर्श खड़ा करने का प्रयास हो सकता है।
4. लेकिन सबसे बड़ा खतरा समाज के लिए है
मनुस्मृति पर बहस यदि इतिहास, दर्शन और सामाजिक सुधार के गंभीर विमर्श से निकलकर केवल 'किसने जलाया और किसने बचाया' तक सीमित हो गई, तो वास्तविक मुद्दे—शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सम्मान, अवसर और जातिगत भेदभाव—पीछे छूट सकते हैं।
इसलिए असली सवाल
मनुस्मृति की आग कितनी देर जलेगी, यह महत्वपूर्ण नहीं।
महत्वपूर्ण यह है कि उसके बाद राजनीति की दिशा क्या होगी।
क्या राजनीति जाति को और गहरा करेगी?
क्या आरक्षण की बहस फिर चुनावी हथियार बनेगी?
क्या सनातन बनाम सामाजिक न्याय का नया ध्रुवीकरण तैयार होगा?
या फिर राजनीतिक दल इतिहास को पीछे रखकर वर्तमान पीढ़ी के अवसर और भविष्य पर बात करेंगे?
मनुस्मृति जलाने से न जाति जलेगी, न असमानता।
और केवल मनुस्मृति की पूजा करने से भी सामाजिक समस्याएँ समाप्त नहीं होंगी।
आखिरकार राजनीति में वही बचेगा जो जनता के वास्तविक सवालों का जवाब देगा।
निष्कर्ष-
“मनुस्मृति जली है, अब देखना यह है कि इसकी राख से राजनीति में जाति की नई दीवार उठती है या सामाजिक न्याय और सनातन संवाद का नया अध्याय लिखा जाता है।”

— संजय शेखर मिश्र
संपादक | विचारक | विश्लेषक
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