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संपादकीय- भारत को भारत बनाएं, ‘न्यू इंडिया’ नहीं : नई पीढ़ी व तकनीक

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Wed, Sep 2, 2026

भारत को भारत बनाएं, ‘न्यू इंडिया’ नहीं!

विकास की रफ्तार के साथ सभ्यता की आत्मा भी बचानी होगी

संपादकीय | संजय शेखर की कलम से

भारत को नया बनाने की जरूरत नहीं है।जरूरत है—भारत को उसकी जड़ों से जोड़कर भविष्य के लिए तैयार करने की।

आज ‘न्यू इंडिया’ विकास, तकनीक, डिजिटल क्रांति और आर्थिक महत्वाकांक्षा का प्रतीक बन चुका है। यह जरूरी भी है। लेकिन क्या केवल तेज सड़कें, ऊंची इमारतें, डिजिटल सेवाएं और बढ़ती अर्थव्यवस्था ही विकसित भारत की पहचान हैं?नहीं।

भारत केवल एक भूगोल नहीं, एक सभ्यतागत चेतना है-

स्वामी विवेकानंद ने भारत की शक्ति उसके चरित्रवान और आत्मविश्वासी मनुष्य में देखी। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने विज्ञान, शिक्षा और युवाशक्ति के सहारे विकसित भारत का सपना देखा। शंकराचार्य परंपरा ने सदियों से विवेक, सत्य, कर्तव्य और लोकमंगल को धर्म की केंद्रीय कसौटी माना।आज इन्हीं विचारों को नई पीढ़ी के साथ जोड़ने की जरूरत है।

Gen Z और Gen Alpha का भारत-

आज का युवा पहले की पीढ़ियों से अलग है। वह सूचना के लिए किसी एक संस्था या व्यक्ति पर निर्भर नहीं। उसके हाथ में इंटरनेट है, उसकी आवाज सोशल मीडिया पर है और उसकी अपेक्षाएं वैश्विक हैं।

वह पूछता है—

रोजगार कहां है?

शिक्षा की गुणवत्ता कैसी है?

परीक्षा व्यवस्था विश्वसनीय क्यों नहीं?

सरकारी तंत्र इतना धीमा क्यों है?

और निर्णय लेने वाली व्यवस्था में युवाओं की वास्तविक भागीदारी कितनी है?

इन सवालों को केवल ‘युवा असंतोष’ कहकर खारिज करना भूल होगी।यही सवाल भविष्य के भारत की दिशा तय करेंगे।

आंदोलन: खतरा या चेतावनी?

लोकतंत्र में आंदोलन सरकार के लिए खतरा नहीं होते।लेकिन जनता की शिकायतों की लगातार अनदेखी सरकार के लिए खतरा बन सकती है।आज आंदोलन की प्रकृति बदल रही है।पहले भीड़ जुटती थी, अब नेटवर्क बनता है।पहले नारा फैलता था, अब वीडियो फैलता है।पहले संगठन आंदोलन खड़ा करता था, अब मुद्दा संगठन खड़ा कर सकता है।यही बदलाव सरकारी तंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

किसी छोटे शहर की परीक्षा, भर्ती, शिक्षा, प्रशासन या स्थानीय न्याय से जुड़ी समस्या कुछ ही घंटों में राष्ट्रीय मुद्दा बन सकती है।इसलिए सरकार की ताकत केवल पुलिस, प्रशासन और कानून में नहीं हो सकती।सरकार की वास्तविक ताकत जनता के विश्वास में होती है।

यदि विश्वास मजबूत है तो आंदोलन सुधार का माध्यम बनता है।

यदि विश्वास कमजोर है तो वही आंदोलन व्यवस्था के प्रति व्यापक असंतोष का प्रतीक बन सकता है।

इसलिए सरकार को आंदोलन से पहले आंदोलन के कारण को पढ़ना होगा।और आंदोलनकारियों को भी समझना होगा कि लोकतांत्रिक विरोध की ताकत तथ्य, संविधान और अहिंसा में है—अराजकता में नहीं।

तीन सवाल, तीन जवाब

① युवा क्या चाहता है?

सिर्फ नौकरी नहीं—अवसर।

सिर्फ डिग्री नहीं—दिशा।

सिर्फ भाषण नहीं—भागीदारी।

Gen Z और Gen Alpha को उपदेश से ज्यादा परिणाम चाहिए। उन्हें व्यवस्था का हिस्सा बनाया गया तो यही पीढ़ी भारत की सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है।

② सरकार को क्या समझना होगा?

युवा को नियंत्रित नहीं, कनेक्ट करना होगा।सरकारी तंत्र को यह स्वीकार करना होगा कि डिजिटल युग में सूचना को रोकना संभव नहीं, लेकिन विश्वसनीय संवाद जरूर संभव है।शिकायत का समाधान जितना जल्दी होगा, आंदोलन की संभावना उतनी कम होगी।

③ धर्माचार्यों की भूमिका क्या हो?

धर्माचार्य का काम किसी दल की राजनीति को मजबूत करना नहीं, बल्कि समाज और सत्ता—दोनों को धर्म अर्थात कर्तव्य और मर्यादा का बोध कराना है।

शंकराचार्य परंपरा की सबसे बड़ी शक्ति उसकी वैचारिक स्वतंत्रता है।

सत्ता बदले तो धर्माचार्य की भूमिका न बदले।सरकार बदले तो सत्य की कसौटी न बदले।यही धार्मिक नेतृत्व की विश्वसनीयता है।

भारत का अगला मॉडल

भारत को ऐसा विकास मॉडल चाहिए जिसमें—विवेकानंद का चरित्र,कलाम का विज्ञान,शंकराचार्य का विवेक।

Gen Z की प्रश्नाकुलताऔर Gen Alpha की तकनीकी क्षमता—एक साथ आगे बढ़ें।

भारत को स्मार्ट सिटी चाहिए, लेकिन उससे पहले स्मार्ट नागरिक चाहिए।भारत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस चाहिए, लेकिन उसके साथ मानवीय विवेक भी चाहिए।भारत को आर्थिक विकास चाहिए, लेकिन उसके साथ समान अवसर और न्याय भी चाहिए।भारत को मजबूत सरकार चाहिए, लेकिन उससे भी ज्यादा जवाबदेह सरकार चाहिए।

और भारत को आंदोलनों से मुक्त समाज नहीं, बल्कि ऐसा लोकतंत्र चाहिए जिसमें आंदोलन की जरूरत कम से कम पड़े क्योंकि संवाद की व्यवस्था मजबूत हो।

अंतिम सवाल

हम भारत को केवल नया रूप देना चाहते हैं या उसकी आत्मा को भी समझना चाहते हैं?

क्योंकि—आध्यात्मिकता बिना आधुनिकता अधूरी है।आधुनिकता बिना नैतिकता खतरनाक है।विकास बिना न्याय अधूरा है।और लोकतंत्र बिना संवाद कमजोर है।

भारत को ‘न्यू इंडिया’ कहने से भारत नया नहीं हो जाएगा।

भारत तब नया होगा जब उसकी पुरानी चेतना और नई पीढ़ी की नई ऊर्जा एक साथ चलेंगी।

इसलिए लक्ष्य केवल यह न हो कि—

“भारत न्यू इंडिया बने।”

लक्ष्य यह हो—

“भारत आधुनिक बने, लेकिन भारतीय बना रहे।”

यही विकास है।यही लोकतंत्र है।यही भारत की असली पहचान है।

— संजय शेखर की कलम से..

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