ब्रेकिंग

जगद्गुरु शंकराचार्य

मामला जमीन विवाद का

मिर्जापुर में चर्चा तेज

महत्व

मामला पहुंचा PMO

सूचना

जरूरी बात- राग-दरबारियों का विष! : सावधान! आपके आसपास भी हो सकते हैं आपके विवेक के पहरेदार।

Editor

Mon, Oct 12, 2026

राज-दरबारियों का विष!

राजा हो, अधिकारी हो या धर्माचार्य—सावधान! आपके आसपास भी हो सकते हैं आपके विवेक के पहरेदार।

सार्वभौमिक सिद्धांत पर आधारित विचार- आज के समय में भी प्रासंगिक है,जो जिम्मेदार लोगों को आत्मसात करना चाहिए-

इतिहास गवाह है कि बड़े-बड़े साम्राज्य केवल बाहरी शत्रुओं से नहीं, बल्कि अपने ही निकटस्थ लोगों की स्वार्थपूर्ण सलाह, चाटुकारिता और छल से भी कमजोर हुए हैं।

राजदरबारी वह नहीं, जो दरबार में बैठता है; राजदरबारी वह है, जो अपने स्वार्थ के लिए सत्य और नेतृत्व के बीच दीवार खड़ी करता है।

यह प्रवृत्ति सत्ता से लेकर धार्मिक संस्थानों तक कहीं भी दिखाई दे सकती है। जब प्रशंसा को निष्ठा, निकटता को योग्यता और चाटुकारिता को समर्पण समझ लिया जाता है, तब सत्य बोलने वाले उपेक्षित होने लगते हैं। धीरे-धीरे नेतृत्व तक केवल वही बातें पहुँचती हैं, जो कुछ लोग उसे सुनाना चाहते हैं।

विडंबना देखिए! जो सामने प्रशंसा करते हैं, वे हमेशा हितैषी नहीं होते और जो सामने असहज प्रश्न पूछते हैं, वे हमेशा विरोधी नहीं होते।

कभी-कभी नेतृत्व के सबसे निकट बैठे लोग ही उसे वास्तविकता से सबसे दूर कर देते हैं।

चाहे राजा हो, अधिकारी हो या धर्माचार्य—किसी की महानता उसके आसपास जुटी भीड़ से नहीं, बल्कि सत्य सुनने की क्षमता और निष्पक्ष निर्णय लेने के साहस से तय होती है।

ईश्वर की सच्ची सेवा हो या समाज के प्रति निष्ठा, उसका प्रमाण किसी दरबार में मिली जगह नहीं, बल्कि व्यक्ति का आचरण और निष्काम कर्म है।

याद रखिए—दरबार से दूरी होना अयोग्यता नहीं और दरबार की निकटता निष्ठा का प्रमाण नहीं। असली पहचान चरित्र, सत्य और कर्म हैं।

— संजय शेखर -khabartimes24

विज्ञापन

विज्ञापन

जरूरी खबरें