: नेशनल हेराल्ड ;ईडी बनाम कांग्रेसी सत्याग्रह
Wed, Jun 15, 2022
राज्य ब्यूरो (छत्तीसगढ़)- सन 1938 नेशनल हेराल्ड की शुरुवात माना जाता है। जवाहर लाल नेहरू ने इसकी शुरुवात की । दरअसल , नेशनल हेराल्ड एक अखबार के रूप में शुरू हुआ जिसमें नेहरू के अलावा करीब 5 हजार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी इसमे शेयर होल्डर बनाये गए थे ऐसी चर्चा तथाकथित तौर पर की जाती रही है। यही अब कांग्रेस के गले की फांस बन गया है। एक तरफ 2014 से लेकर अब तक भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने राजनैतिक डिबेट,मंच से लेकर कोर्ट तक कांग्रेस के वारिश राहुल गांधी को निशाने पर लिए फिरते हैं। हालांकि राहुल गांधी के पीछे भाजपा हाथ धोकर पड़ी है।
कांग्रेस शासित प्रदेशों के नेता व मुख्यमंत्री दिल्ली में जाकर सत्याग्रह की राह पकड़े थे,लेकिन पुलिस ने जबरिया घसीटते हुए पुलिस कस्टडी में ले लिया। ये सभी कांग्रेसी अपने नेता राहुल गांधी से हो रही ईडी पूंछतांछ का विरोध प्रदर्शन करने राजधानी दिल्ली की सड़कों पर बैठे थे।
अब हम बात करते हैं राजनीतिक मतभेदों की तो बता दें कि, भाषण चाहे खुले मैदान में हो या संसद में,भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और प्रधानमन्त्री मोदी के निशाने पर कांग्रेस हमेशा रहती है। परदादा जवाहरलाल नेहरू से शुरुवात होती है और नाती राहुल गांधी तक को लपेटा जाता है। जाहिर सी बात है कि,भाजपा अपने नारे "कांग्रेस मुक्त भारत" को पूरा करने के लिए कोई कोर कसर नही छोड़ रही है। इसका जिक्र अक्सर भाजपा के मंचीय भाषणों पर होता रहता है। यही कारण है कि अब कभी राजनीतिक तौर तरीकों से तो कभी जांच एजेंसियों के माध्यम से कांग्रेस के बड़े नेताओं की पुरानी किताबें खोल ही दी जाती हैं।
नई बोतल में पुरानी शराब का सहारा-
इस बार भी कहानी कुछ ऐसी ही है। नेशनल हेराल्ड मामले को फिर से जिंदा कर दिया गया और काग्रेेेस के राहुुल
गांधी को समन भेज ईडी बुला लिया गया। हालाकिं यह मामला राहुल के समय का नही है लेकिन दादा के समय की शुरुवात पोते पे सवार वाला मामला है। यह उसी तरह है जैसे किसी नई बोतल में पुरानी शराब भर दी जाय। दरअसल जब से मोदी सरकार केंद्र में आई है तब से अन्य पार्टी के नेताओं कि नींद तो उड़ी हुई है क्योंकि ईडी और सीबीआई का पावर सबको पता है और उस करंट का बटन भी किसके हाथ है यह भी पता है। इसलिए दो राज्यों के मुख्यमंत्री भी राहुल जी के चहेतों में से हैं। खासकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल तो कद्दावर व साहसिक कांग्रेसी माने जाते हैं जो राहुल के करीबी भी हैं। राहुल के कृपा पात्र बघेल ने दिल्ली जाकर और पुलिस के हाथों गिरफ्तारी देकर यह सिद्ध भी कर दिया कि उनके नेता के प्रति मन मे कितना आदर भाव है। राहुल के लिए भूपेश कुछ भी कर सकते हैं ऐसा उन्होंने कहीं कहीं अपने उद्गार व्यक्त करते रहते हैं। छत्तीसगढ़ के राजनीतिक पुरोधा स्व मोतिलाल वोरा का भी नाम शामिल होने से मनी लांड्रिंग का केस अटका पड़ा है। राष्ट्रीय कांग्रेस के तत्कालीन विश्वस्त सलाहकार व धनकुबेर रहे मोतीलाल वोरा जी का इस्तेमाल हमेशा से ही कांग्रेस करती रही है। कांग्रेस के संकटमोचक रहे छत्तीसगढ़ के "बाबू "जी के नाम का हमे लगता है कहीं अब भी सहारा न ले कांग्रेस।
समर शेष है पर विशेष है..
राजनीति
में
जितने भी रंग दिखते हैं वे सभी चुनावी रंग में रंगे होते हैं। परिणामस्वरूप आज की फसल कल काटी जाएगी। यदि अपराध सिद्ध होता है तब भाजपा चारों तरफ चिल्ला चिल्ला के चोरी का सरदार सिद्ध करने में बाज नही आएगी जिसका कांग्रेस को बड़ा नुकसान हो सकता है। चूंकि 2023 में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने हैं और 2024 में लोकसभा भी। अन्य कोई दल भाजपा के सामने राष्ट्रीय स्तर पर हैं नही,सिर्फ कांग्रेस ही एक पार्टी रह गई है जो गला फाफ फाड़कर मोदी का विरोध करती है,हालांकि विपक्ष का काम ही है सत्ता पक्ष का विरोध करना। यदि विपक्ष नही होगा तो लोकतंत्र कैसे बचेगा । इसलिए राजनीतिक गोटियां सरकती रहनी चाहिए। इस तरह का माइंड प्रेशर का काम राजनीतिक तंबू को उखाड़ने में किया जाना स्वाभाविक है। हालांकि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस अभी कमजोर नही हुई है ,बल्कि पहली बार मुख्यमंत्री बने भूपेश बघेल का कद व भरोसा छत्तीसगढ़ की जनता अब अधिक करने लग गई है। अन्यत्र इसका असर पड़ सकना लाजमी है। राहुल के बाद सोनिया से भी पूंछतांछ ईडी करेगी तो क्या कांग्रेसी बड़े पैमाने में धरना प्रदर्शन करेंगे या फिर कानून व्यवस्था का नैतिकता से पालन होगा यह देखने वाली बात होगी। कुछ भी हो राजनीतिक बिसात का मंच गरम है जो चरम पर हो सकता है। अभी तो शुरुवात है कुछ महीने चुनाव के बचे हैं ,घोषणा होनी शेष है । और कांग्रेस मुख्य नेत्री सोनिया गांधी का बयान भी शेष है। समर शेष है पर विशेष है । इसमे दो सवाल और उठते हैं कि यदि ईडी की कार्यवाही गलत है तो फिर राहुल गांधी को ईडी आफिस न जाकर खुद सड़क पर बैठ जाना चाहिए ,दूसरी बात यह कि फिर जो जांच चल रही है पूंछतांछ हो रही है उसका पूरे मन से सहयोग करना चाहिए। राहुल को चाहिये कि ,गलत नही हैं तो पूरे मनोयोग से कानून का पालन होने दें ताकि उनकी निष्पक्षता जनता से सामने सकारात्मक रह सके।
: गुटबाजी में बंटी भाजपा में चेहरे बदलने से मिल सकती है मजबूती
Mon, Jun 13, 2022
दुर्ग- छत्तीसगढ़ में 15 वर्ष तक सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी क्षेत्रीय खेमेबाजी की शिकार हो गई। यह बात किसी से छिपी हुई नही है कि कई दिग्गज अपना खेमा बनाकर संगठन को कमजोर कर दिए हैं। भारतीय जनता पार्टी की विगत 15 सालों तक लगातार सरकार राज्य में थी ,रमन सिंह उस सरकार के मुखिया रहे। लेकिन गुटबाजी और घिसेपिटे वही पुराने चेहरों पर पार्टी दांव आजमाती रही जिससे चुनाव में हार का स्वाद चखना पड़ा। लंबे समय तक सत्ता में रही भाजपा पिछला चुनाव हार गई। यह तब और चिंताजनक हो जाता है जब केंद्र में मोदी सरकार की लहर चल रही हो अन्य कांग्रेस शासित राज्यों में मोदी लहर के कारण भाजपा की सरकार बन गई और जहां लंबे अरसे तक सरकार रही हो वहां मोदी लहर में भी सत्ता से बेदखल हो जाना न पचने वाली पार्टी के लिये अतिशयोक्ति हो जाती है। इसकी समीक्षा हुई जिसमें पार्टी के कुछ बड़े चेहरों का ही चेहरा नजर आया। लेकिन संगठन अनुशासन का डंडा चलाने में लचर दिखा। जिसकी बदौलत कांग्रेस का जनाधार व विश्वास लोगों में बढ़ता गया । विकल्प के रूप में अपनी खीज निकालने के लिए जनता ने कांग्रेस को सत्ता में बैठाकर भूपेश बघेल पर भरोसा जताया। भाजपा आज भी जनहित के मुद्दे से भटक कर गुटबाजी का दंश झेल रही है। छत्तीसगढ़ में गाँव गरीब और कल्याणकारी नीतियों से भटक कर नेताओं को खुश करने में लगी यह पार्टी नए कार्यकर्ताओं पर भरोसा नही जता पाई है।
कुर्सी के मोहजाल में फंसे नेता जनता का भरोसा जीतने में कोसों दूर-
दुर्ग में सोमवार को आयोजित यह संभागीय गरीब वंचित कल्याककारी योजनाओं का कार्यक्रम जिसमे खाली कुर्सियां पार्टी की सूरतेहाल बयां कर रही हैं। मंच पर मुख्यातिथि केंद्रीय राज्य मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते सहित सारे दिग्गज नेता आसीन हैं,पूर्व मंत्री,राष्ट्रीय नेत्री राज्य सभा सांसद सहित तमाम पूर्व क्षेत्रीय विधायक भी और जिला अध्यक्ष भी मंचस्थ हैं। दुर्ग भिलाई में दो गुट में बटी भाजपा आज इसकी शिकार हो गई।
आठ जिलों के अध्यक्षों ने मिलकर भी नही भर पाए सभा मे लगाई गई कुर्सियां-
दुर्ग में आयोजित गरीब वंचित कल्याण जनसभा में हजार भी लोग नही पहुंच पाए। मंच पर भाजपा के लगभग सभी पदाधिकारियों, पूर्व मंत्रियों व विधायकों की उपस्थिति तो जरूर रही लेकिन कुर्सियां खाली रहीं। कार्यकर्ताओं ने लगता है भरोसा खो चुके हैं तभी तो संभागीय कार्यक्रम में कुर्सियां भर नही पाई।