संपादकीय
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"राजनीतिक बयानबाजी से जीवन नही बदला करता"!
राजनीति वह आईना है जिसमें सच तश्वीर वह नही दिखती जो सच में होती है,बल्कि वह आभासी छवि नजर आती है जो होती नहीं,दिखाई जाती है। स्वतंत्र भारत के भोर की राजनीति से लेकर आज 2026 के राजनीतिक दोपहरी की चर्चा हम करेंगे,जिसमें दो बड़ी राजनीतिक पार्टियों की सत्ता ने भारत को क्या दिया और अब क्या चाहता है भारत देश।
कांग्रेस बनाम भाजपा: किसने भारत को क्या दिया?
सत्ता बदली, नीतियां बदलीं—लेकिन असली सवाल आज भी वही है: आम भारतीय के जीवन में कितना बदलाव आया?
संजयः उवाच-
भारत की राजनीति में कांग्रेस और भाजपा केवल दो राजनीतिक दल नहीं हैं। दोनों ने अलग-अलग दौर में भारत की दिशा तय की है। इसलिए तुलना भावनाओं से नहीं, इतिहास, नीतियों और परिणामों से होनी चाहिए।
स्वतंत्र भारत की पहली सरकार ने जो किया-
कांग्रेस के लंबे शासनकाल ने जिस भारत को देखा, वह गरीबी, सीमित औद्योगिक क्षमता, खाद्य संकट और कमजोर आधारभूत ढांचे वाला भारत था। बाद के दशकों में कांग्रेस सरकारों ने हरित क्रांति, सार्वजनिक क्षेत्र, पंचवर्षीय योजनाओं, ग्रामीण रोजगार और अधिकार आधारित कानूनों के माध्यम से राज्य की कल्याणकारी भूमिका को मजबूत किया।
RTI, मनरेगा और खाद्य सुरक्षा कानून जैसे कदमों ने नागरिक को सरकार से अधिकार मांगने का कानूनी आधार दिया।
लेकिन कांग्रेस के अंतिम वर्षों पर नीतिगत गतिरोध, भ्रष्टाचार के आरोप और आर्थिक सुधारों की धीमी गति जैसे सवाल भी उठे।
फिर आया भाजपा का दौर।
2014 के बाद शासन की भाषा में बड़ा बदलाव दिखाई दिया—डिजिटल इंडिया, जनधन, आधार, मोबाइल, DBT, UPI, बुनियादी ढांचा, प्रत्यक्ष लाभ और मजबूत केंद्रीय नेतृत्व।
जनधन खातों की संख्या 2026 में 58 करोड़ से अधिक हो चुकी है।
UPI इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वित्त वर्ष 2025-26 में UPI पर 24,162 करोड़ से अधिक लेनदेन हुए और कुल मूल्य लगभग ₹314 लाख करोड़ रहा।
DBT ने भी सरकारी सहायता के वितरण का तरीका बदल दिया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2026 तक DBT के माध्यम से लगभग ₹49.09 लाख करोड़ सीधे लाभार्थियों तक पहुंचाए जा चुके थे।
यानी कांग्रेस के दौर में “
सरकार नागरिक तक पहुंचे”
की अवधारणा मुख्यतः कानूनों और कल्याणकारी योजनाओं से मजबूत हुई, जबकि भाजपा के दौर में उसी व्यवस्था को डिजिटल तकनीक और प्रत्यक्ष हस्तांतरण से तेज करने का प्रयास हुआ।
लेकिन यहीं एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है।
डिजिटल भुगतान बढ़ना और GDP बढ़ना महत्वपूर्ण है, लेकिन क्या इससे हर युवा को रोजगार मिला?
हाईवे और एक्सप्रेसवे बनना महत्वपूर्ण है, लेकिन क्या किसान की आय और छोटे कारोबारी का मुनाफा उसी गति से बढ़ा?
कल्याणकारी योजनाएं पहुंचना महत्वपूर्ण है, लेकिन क्या भारत आत्मनिर्भर रोजगार अर्थव्यवस्था बन पाया?
यही वह जगह है जहां किसी भी सरकार की असली परीक्षा शुरू होती है।
कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत क्या रही?
संस्थागत ढांचा, लोकतांत्रिक संस्थाओं का विस्तार, सामाजिक कल्याण और अधिकार आधारित कानून।
कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी?
लंबे शासन के बाद व्यवस्था में भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और निर्णय लेने की धीमी गति की शिकायतें।
भाजपा की सबसे बड़ी ताकत?
तेज निर्णय, डिजिटल सार्वजनिक ढांचा, इंफ्रास्ट्रक्चर और योजनाओं को बड़े पैमाने पर लागू करने की क्षमता।
भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती?
रोजगार, सामाजिक विश्वास, संस्थागत संतुलन, महंगाई और विकास के लाभ का समान वितरण।
इसलिए इतिहास का निष्कर्ष यह नहीं हो सकता कि कांग्रेस पूरी तरह गलत थी और भाजपा पूरी तरह सही है, या इसका उलटा।
सच्चाई इससे ज्यादा जटिल है।
कांग्रेस ने भारत की कई संस्थागत और कल्याणकारी नींव तैयार कीं। भाजपा ने उस व्यवस्था के एक बड़े हिस्से को डिजिटल, केंद्रीकृत और परिणाम-केंद्रित बनाने की कोशिश की।
अब 2026 का भारत कांग्रेस और भाजपा दोनों से आगे का सवाल पूछ रहा है—
अगला भारत केवल बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं, बड़ा रोजगार देने वाली अर्थव्यवस्था कब बनेगा?
विकास केवल शहरों में नहीं, गांव के किसान और छोटे व्यापारी की जेब में कब दिखाई देगा?
राजनीति चुनाव जीतने से आगे बढ़कर शासन की गुणवत्ता की प्रतियोगिता कब बनेगी?
और शायद
सबसे बड़ा सवाल—
भारत को कांग्रेस मॉडल चाहिए, भाजपा मॉडल चाहिए या दोनों की अच्छी नीतियों को लेकर एक नया भारतीय मॉडल चाहिए?
क्योंकि लोकतंत्र में सरकार बदलना ही परिवर्तन नहीं है।
वास्तविक परिवर्तन तब है, जब सरकार बदलने के साथ नागरिक का जीवन भी बदले।
— संजय शेखर मिश्र,संपादकीय: संजयः उवाच
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