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Editorial- सनातन संवाद : राजसत्ता की पुकार,धर्मसत्ता का चाहिए आशीर्वाद!

Editor

Sat, Apr 11, 2026

दो शक्तियों के बीच का तांडव कहीं सनातन पर भारी न पड़ जाए!

जब दो शक्तियों की टकराहट होती है तो विध्वंस मचता है तबाही होती है वह किसी भी रूप में हो सकती है। प्राचीन समय में सत्य और असत्य के बीच की खाई सुर और असुर के रूप में पड़ती रही और संग्राम मचता रहा,सभ्यताएं पिसती रही हैं। धर्म और अधर्म की राहें सत्य व असत्य की परिभाषाओं को रेखांकित करती हैं। ऐसा लगभग हर युग में तत्कालीन परिदृश्यों से दो चार होने का क्रम चलता रहा है।

कमोवेश,स्थिति आज भी वही है। नैतिकता,धर्मगत न्याय व्यवस्था और वैदिक संस्कृति परंपरा एवं राजनीतिक कुटिलता की समावेशित राजसत्ता के बीच का आधुनिक द्वंद,समाज व देश की सनातनी व मानवीय संस्कृति में झंजावात पैदा कर रहा है। भ्रम की स्थिति में समाज कराह रहा है। गो माता की हत्या से निकलने वाला रूधिर मानवीयता पर कलंक बनकर करुण क्रंदन विनाशकारी रुदन कर रहा है। सभ्यताएं दम तोड़ रही हैं,समाज लज्जा विहीन होकर अमर्यादित हो रहा है,जिंदगियां अधूरी सी हो गईं हैं,शिक्षा,संस्कृति,संस्कार कुपोषित हो गए हैं। नदियां दूषित हैं,ग्रंथ व गुरु विहीन समाज दिशाविहीन है,गो माता के आंखों में करुणा का अश्रुपात हो रहा है। लेकिन राजसत्ता मदान्ध होकर सिंहासन की ओर टकटकी लगाए मदमस्त है। कार्यप्रणाली दूषित और अपराधी हो गई,तेज धार वाली कलमें गिरवी हो गईं,ललकारने वाले शूरमा गूंगे बन गए ।

अब,ऐसे में प्रकृति क्या करेगी, तो उत्तर मिलता है कि जब राजसत्ता मदान्ध होती है तब धर्मसत्ता मुखर होकर शंखनाद करती है लोक कल्याण के लिए मानवीय विकास व संवर्धन के लिए।

आज जो गूंज कतिपय सुनाई दे रही है तो वह धर्मसत्ता के शंखनाद की है,यदि सुन पा रहे हो तो ध्यान से सुनो तुम्हे वही आवाज सुनाई पड़ेगी जो शांत क्षितिज में आत्मशक्ति को जागृत कर तुम्हे बलवान बनाती है। यह ध्वनि है शंकर के डमरू की,यह टंकार है शिव के धनुही की क्योंकि शिव व जग चुके हैं।

वह शिव शंकराचार्य भगवान के रूप में हैं पहचानों और जागृत भाव में उनका अनुसरण करो।

यह आवाज उत्तर दिशा से आ रही है,घोर अंधकार में ज्योति बनकर आपके मार्ग को प्रशस्त कर रही है। क्योंकि यह है ज्योतिर्मठ!

ज्योतिर्मठ के शंकर अर्थात शंकराचार्य भगवान स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद जी सरस्वती महाराज ने धर्म का शंखनाद कर दिया है मानव के उत्थान के लिए,भय मुक्त होने के लिए और गो माता के सम्मान के लिए,हिंदुओं के स्वाभिमान के लिए।

गो माता रक्षार्थ पूरे उत्तर प्रदेश में उतरने के लिए चतुरंगिणी सेना कमर कस चुकी है। यह चतुरंगिणी सेना कोई वैतनिक सेना नही है बल्कि वैदिक आर्य सनातन के परंपरागत वह हिन्दू हैं जिनमे गो माता के प्रति सम्मान का भाव जीवित है,जिनमें अपने गुरुओं व पूर्वजों के प्रति आदर भाव शेष है। अखंड भारत के पूर्वजों का आशीर्वाद वर्तमान में राष्ट्र भावना को जागृत कर रही है।

यह गोविष्ठि यात्रा वृत्तासुर के दमन के लिए आवश्यक होगी जिसने गो माता को खुलेआम लहूलुहान किया है। इस गोविष्ठि यात्रा के स्वागत के लिए प्रदेश के गांव गांव में जन जन के हाथ मे अभिनंदन थाल सजा है,जिसका उद्देश्य है अपने परमाराध्य का स्नेह पाना।

परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज एकमेव सत्य के प्रति मुखरित धर्मगुरु हैं जो गाय,गंगा,मठ मन्दिर,भगवत विग्रह और धर्म के लिए आवाज बुलंद करते हैं।

ऐसे में सत्ता को सनातनी समाज का यदि प्रेम पाना है तो धर्म सत्ता के समक्ष दण्डवत होना चाहिये।

जब जब राजसत्ता,व्यास सत्ता से आशीर्वाद ग्रहण कर अपने कदम बढ़ाई है, तब तब अखंड साम्राज्य को प्राप्त कर अभय राज्याधिकार प्राप्त हुआ है।

हमें लगता है कि यूपी की सत्ता देर से ही सही परन्तु सुदृढ रूप से अपने गुरु के मूलमंत्र को आत्मसात कर परम धर्माधीश से स्नेह व आशीर्वाद प्राप्त कर अखंड विजय का वरदान प्राप्त कर सकेगी। यही राजसिंहासन पर काबिज आवरण के प्रति सच्चा आचरण होगा। राजसत्ता ने भी भगवा पहन रखा है और धर्म सत्ता भगवा रंग के रक्षक व प्रतिपालक हैं,दोनों में यदि समन्वयता होने से धर्म की एक अलग चमक रहेगी।

दूसरों को सत्ता पर काबिज होने का मौका क्यों दें-

अहंकारी राजसत्ता से जनता विलग होने को तब मजबूर हो जाती है जब धर्मपथ पर कांटे बिछने शुरू हो जाते हैं। जब आस्था को कुचल कर,सभ्यता को रौंद कर शासन किया जाना दिखने लगता है तब जनता भी अपना मार्ग धीरे से विलग कर सत्ता के प्रतिकार में एकजुट होने लगती है। जिस प्रदेश की शासन व्यवस्था को भगवाधारियों का साथ मिला वही शासन आज निरंकुश होकर भगवा पर प्रहार करने का पर्याय बनती गई है। इस प्रहार से जनभावना आहत हुई और विश्वास विखंडित हुआ है। और जहां विश्वास इतर होने लगता है तो बगावत लाजमी हो जाती है। लोग कहीं न कहीं भ्रमित होकर व्याकुल हैं।

मौजूदा हालात यही बन रहे हैं कि निरंकुशता को रौंदना है तो जनमत संग्रह कर चुपचाप अपनी उंगली को दूसरी तरफ घुमा कर रख दिया जाय। यह स्थिति सामान्य नही परन्तु अंदर अंदर मजबूत हो गई है। विपक्षियों ने अपनी जुबान को साधते हुए,बोली में विनम्रता का शहद की चासनी लगा कर तैयार बैठे हैं धर्म सत्ता की चौखट पर दण्डवत होने को ।

और हो भी रहे हैं दण्डवत । सन्तो को क्या चाहिए,किये गए गलतियों की क्षमा याचना,त्राहिमाम व शरणागति जैसे शब्द व आंखों में हल्का सा पानी जो छलक सके कि उनका दिल अब शरणागति की पनाह मांग रहा है। धर्मगुरु तो होते ही हैं नवनीत के समान,वह जल्दी ही अपने दिल के बड़े दरबार में समाहित कर शरणागत को बड़ा आसन दे देते हैं। यही कार्य आज की सत्ता को करना चाहिए,निश्चित रूप से उत्तर दिशा की ज्योति का तेज पूरब की गद्दी को पुनः प्रकाशित कर देगा। मतलब साफ है ज्योतिर्मठ का आशीर्वाद गोरखपुर के बल को रेखांकित कर राजधानी में सिंहासन आरूढ़ करने का योगकारी बल प्रदान करेगा। बशर्ते,राजसत्ता अब देर न लगाए !

कलम से-

  • संजय

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